
टिंगू पाशा दीवार नहीं फांद पाता
उस पार हरी - हरी घास पर
उसके ख़ास दोस्त घंटो लोटते रहते हैं..
वो दीवार की ठंडक पर कान चिपकाए
उनके ठहाकों को महसूस करता रहता है
मगर कोई भी उसका नाम नहीं पुकारता..
टिंगू पाशा को gate के उस पार
जाने की आज्ञा नहीं मिलती
वो गुज़रते मंज़िलों को
एक जाली के ज़रिये देखता है
उस जाली से धूप कुछ ऐसे
छन कर आती है जैसे
रोशनी का एक गुच्छा
अँधेरे के पहरे से बचकर निकल आया हो..
उसको तो कभी गुनगुनाते हुए
बादल दिखे ही नहीं..
टिंगू पाशा से मिलने अब कोई नहीं आता
उसकी कटोरी अक़्सर खाली रहती है
उसके हसीन बाल झड़ते - झड़ते
फ़र्श पर ढलती उम्र के निशान छोड़ जाते हैं ..
लेकिन उसके इरादों की आवाज़
कई बार, उस दीवार, gate के उस पार
से सुनाई देती है ..
आओ टिंगू पाशा, बादलों पर सैर करें
फिर तुम इस संगदिल जहां पर
जम के टांग उठाना...





