
मैं फिर से एक क़तरा बनना चाहता हूँ
जहाँ से आया था वहीं जाना चाहता हूँ
क्या हुआ जो शायर, विद्वान बन गए?
सारी मेहनत तो फ़िक्र करने में लग गयी..
सारी मज़दूरी या तो कोई अज़ीज़ ले गया
या फिर कोई मुझसे भी ज़्यादा बर्बाद..
आखिर में कोई पीठ थपथपा देता है
कोई वाह-वाह करके गंगा नहा लेता है..
और अगर कभी, किसी की हंसी का दीवाना होकर
कुछ सच्चा करना चाहा,
तो करता रहा, करता रहा..
वो हंसते रहे, हंसते रहे..
लेकिन मैं क्या था? क्या रहा?
इसीलिये..
मुझे फिर से एक क़तरा बना दो..