
मैं फिर से एक क़तरा बनना चाहता हूँ
जहाँ से आया था वहीं जाना चाहता हूँ
क्या हुआ जो शायर, विद्वान बन गए?
सारी मेहनत तो फ़िक्र करने में लग गयी..
सारी मज़दूरी या तो कोई अज़ीज़ ले गया
या फिर कोई मुझसे भी ज़्यादा बर्बाद..
आखिर में कोई पीठ थपथपा देता है
कोई वाह-वाह करके गंगा नहा लेता है..
और अगर कभी, किसी की हंसी का दीवाना होकर
कुछ सच्चा करना चाहा,
तो करता रहा, करता रहा..
वो हंसते रहे, हंसते रहे..
लेकिन मैं क्या था? क्या रहा?
इसीलिये..
मुझे फिर से एक क़तरा बना दो..
4 comments:
ilike.
this reminds me of that one line i wrote in my blog "why doesn't life has a reset button?"
Don't ask me how or why. THis also reminds me of that fact that am too lazy. hehe.
Good one chatty. a gem. i loved the "majdoori ya toh koi.."
Clap! Clap! Very well crafted again. After reading it 2-3 times, i realised that it kinda defines my current state of mind....i love it :)
सारी मज़दूरी या तो कोई अज़ीज़ ले गया
या फिर कोई मुझसे भी ज़्यादा बर्बाद....har baari kuch aisa likhna jo logon ko dobara padne par majboor kare, achi baat nahin hai ;)
leave the bloody advertising world..publish you work..show the film world what talent we have :) i love your work, i can read it again and again ana again and still find new meanings everytime..
Main phirse ek katra banna chahta hoon - that line itself is evocative of so many things ...
Post a Comment